कविता -एथेंस, सुकरात और मैं-प्रतीक झा 'ओप्पी'
कविता -एथेंस, सुकरात और मैं-प्रतीक झा 'ओप्पी'

एथेंस, सुकरात और मैं

जब सुना मैंने एथेंस का नाम
उस पावन माटी को जाना
जहाँ सुकरात ने जन्म लिया
जहाँ प्रकट हुआ सत्य का आलोक।

सादगी जिसने जीवन अपनाया
सत्य हेतु हर कष्ट सहा
युवाओं को दी नई दिशा
जीवन का मर्म सिखा दिया।

सत्य क्या है? प्रश्न उठाया
अज्ञान ही दुखों की जड़ बताया
नैतिकता के दीप जलाए
तर्क से भ्रम के पर्दे हटाए।

राजनीति की कुटिल चाल को
निर्भीक स्वर से ललकारा
अन्याय और भ्रष्टाचार के सम्मुख
सत्य का दीप सदा जलाया।

धन-वैभव की दीवारें तोड़ी
भौतिक सुख से नाता मोड़ा
ज्ञान-पथ शाश्वत अपनाया
चेतना का प्रकाश बिखेरा।

जिन गलियों में वह चलते थे
उनमें मैं खुद को पाता हूँ
एगोरा, स्टोआ के द्वारों पर
सुकरात को सदा बुलाता हूँ।

जब न्याय स्वयं अन्याय बना
सत्य असत्य से हारा
फिर भी डिगा नहीं वह संत
मृत्यु को भी ललकारा।

हेमलॉक का प्याला उठाया
मुस्कान सहित विष को पिया
प्लेटो संग सिसक उठा मैं
पशु-पक्षी, पत्थर भी रो पड़े।

हे एथेंस! महान तेरी भूमि
तेरी गलियों में अब भी रहता हूँ
जहाँ जनमा वह संत अमर
युगों तक गूँजा जिसका स्वर।

सुकरात! अमर विचार तुम्हारे
गूँजेगा युगों तक स्वर तुम्हारे
ज्ञान का सूरज, मानवता का मान
तुम्हारा सत्य, युगों का गान।

प्रतीक झा ‘ओप्पी’
इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज, उत्तर प्रदेश

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